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“जैसे उकाब अपने घोंसले को हिला-हिलाकर अपने बच्चों के ऊपर - ऊपर मण्डलाता है, वैसे ही उसने अपने पंख फैलाकर उसको अपने परों पर उठा लिया।” (व्यवस्था विवरण ३२:११)


 “जैसे उकाब अपने घोंसले को हिला-हिलाकर अपने बच्चों के ऊपर - ऊपर मण्डलाता है, वैसे ही उसने अपने पंख फैलाकर उसको अपने परों पर उठा लिया।” (व्यवस्था विवरण ३२:११)



      जैसे उकाब अपने बच्चों को संभालता है, वैसे ही केवल यहोवा ने अपनी प्रजा को चलाया। सभी पक्षियों में उकाब ही एक एसा पक्षी है जो अपना घोंसला ऊँचे चट्टानों पर बनाता है। गोरैया एवं अन्य पक्षी घर में या पेड़ों पर घोंसला बनाते हैं और वहाँ अँडे रखते है। परन्तु उकाब को जब तक ऊँचे से ऊँचा स्थान न मिले तब तक वह यहाँ वहाँ फिरता ही रहता है। किसलिये? कारण की उसकी ऐसी इच्छा होती है कि उसके बच्चे ऊँचे से ऊँचा उड़ना सीखें। बच्चें तो अभी कोमल अवस्था में ही होते हैं तभी माता उकाब अपने घोंसले को खूब हिलाने लगती है। परिणाम स्वरूप बच्चे बाहर गिर जाते हैं। वे रोने लगते हैं और मानों कि माता को ऐसा कह रहे हों कि ‘माँ, हमारे प्रति इतनी क्रूरता मत दिखाओ, हम पर दया करो।’ परन्तु माता उकाब नहीं सुनती। जब वह देखती है कि बच्चे नीचे गिर रहें हैं तब वह अपने पंखों को फैलाती है और उन्हें परों पर उठा लेती है। और वापस ऊँचे पर जाती है और बच्चों को नीचे की ओर छोड़ देती है। बारबार वह वैसा करती है। इस रीति से बच्चे खूब ऊँचे पर उड़ना सीखते हैं और उनके पंख भी बहुत मजबूत बनते हैं। वे लम्बे फांसले को भी पार कर सकते हैं, परन्तु उसके लिये उन्हें कठिन परीक्षाओं में से होकर गुजरना पड़ता है।


      प्रभु हमसे कहता है कि, ‘में चाहता हूँ कि तुम मेरे साथ ऊँचे स्थानों पर आओ इसलिए मुझे तुम्हारें घोंसले को हिलाना चाहिए। बहुत ऊँचे उड़ान के लिये तुम्हें संसार के मुश्किलों में से होकर गुजरना पड़ेगा। यदि आप परमेश्वर की संतान बन गये हैं तो परमेश्वर आपको हिलाये इसके लिये आप तैयार रहें। आपको ऊँचे उड़ना हो तो आपको मजबूत पंखो की जरूरत है। तभी आप उद्धार के ऊँचे पर्वत शिखरों की सुंदरता का अनुभव कर सकते हैं। यशायाह ५८ः१४ “मैं तुझे देश के ऊँचे स्थानों पर चलने दूँगा।”


      जो युवा अपनी शक्ति पर आधार रखते हैं, वे जरुर गिर जाएँगे। परन्तु जो प्रभु की बाट जोह रहे हैं वे नया बल प्राप्त करेंगे। (यशा. ४०ः३१) वे उकाब की नाई पंखों को फैलाएँगे। प्रभु की बाट जोहने वालों के लिये उनकी मुश्किलें ही ऊँचे उड़ान का कारण बनती हैं। यदि उनकों घोंसलों में ही सहीसलामत रखा जाय तो वे गौरैयों के समान ही रहेंगे और ऊँचे उड़ नहीं सकेंगे।

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