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“और जो कोई अपना क्रूस न उठाए, और मेरे पीछे न आए; वह भी मेरा चेला नहीं हो सकता।” (लूका १४:२७)


 “और जो कोई अपना क्रूस न उठाए, और मेरे पीछे न आए; वह भी मेरा चेला नहीं हो सकता।” (लूका १४:२७)



     परमेश्वर ने अब्राहम को यह आज्ञा दी कि - तेरा देश छोड़कर एक नये देश में जा। लूत को अब्राहम के साथ जाने के लिये परमेश्वर ने नहीं कहा था। फिर भी मानवीय सहानुभूति के कारण अब्राहम लूत को साथ ले जाने के लिये तैयार होता है। लूत अब्राहम का भतीजा था, और उसने अब्राहम से विनंती की होगी कि, ‘चाचा, कृपा करके मुझे भी साथ ले जाइये।’ कदाचित् प्रारंभ में अब्राहम ने लूत के आग्रह को अस्वीकार किया होगा। परन्तु बाद में उसके आँसू देखकर अब्राहम ने हामीं भर दी होगी। मानवीय प्रेम एवं भावुकता के आधीन होकर हम कई बार परमेश्वर के हृदय के श्रेष्ठ विचारों को खो देते हैं। कई विश्वासी लोग किसी एक के प्रेम से आकर्षित होकर हानि उठाते हैं। परमेश्वर की इच्छा की अवहेलना करके अनाज्ञाकारी बनते हैं।


      अब्राहम लूत को ले तो जाता है परन्तु कुछ ही समय में दोनों के चरवाहे के बीच झगड़े उत्पन्न होते हैं (उत्पत्ति १३: ७) मानवीय प्रेम हंमेशा झगडे़ लाता हैं। इसे हमको याद रखना चाहिये कि हरेक प्रेमभाव चाहे वह पति-पत्नि, बच्चे, माता-पिता, भाई-बहन, सगे-स्नेही अनेक लिये हो परन्तु प्रभु यीशु मसीह के द्वारा पवित्र किया गया होना चाहिये। यदि पवित्र नहीं हो तो अवश्य एक दिन वे मुश्किलें खड़ी कर देंगे। मत्ती १२:४८-५० में हम देखते हैं कि प्रभु यीशु की माता और उसके भाईओ की यह कल्पना थी कि प्रभु पर उनका कुछ विशेष अधिकार हैं। उन्होंने प्रभु से मिलने के लिये संदेश भेजा। परन्तु प्रभु क्या कहता हैं? ... कौन है मेरी माता और कौन हैं मेरे भाई? जो कोई मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चले, वही मेरा भाई और बहन और माता हैं।’ पति-पत्नि, बच्चे, माता-पिता, भाई-बहन या सगे-संबंधी के प्रति प्रेम आपको परमेश्वर से दूर न रखे इसलिये सचेत होकर रहिये। कितनी ही बार हम ऐसे लोगों को देखते हैं जो प्रभु की इच्छा को आधीन होने के बजाय सगे-प्रियो के प्रेम को ज्यादा महत्त्व देते हैं। उनकी कल्पना यह होती है कि अमुक अमुक को हम कैसे छोड़ सकते हैं? कैसे दुःखी कर सकते हैं? परन्तु वे भूल जाते हैं कि परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध जाने के कारण पवित्र आत्मा कितना शोकित होता हैं।

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